आज कई विषयों पर बात करनी है। पर किसे पहले चुनु। लगा बिना लीपापोती के आत्मस्वीकारोक्ति से आरंभ करना श्रेयस्कर होगा।
एक बात एडमिट करता हूँ इतना पोजेसिव हूँ कि तुम्हारी शादी के बारे में सोचना कभी अच्छा ही नहीं लगता था।
श्री मेरी बड़ी हो रही है और अभी तक मैं अपने आपको मानसिक तौर पर तैयार नहीं कर पा रहा हूँ इतने नाजो से और मेहनत से पालने के बाद मुझे उसे किसी को सौंप देना चाहिये। जिद्द रहती है मेरे बच्चे को मैं किसी और को क्यों दूँ।
हाँलाकि मैं स्वयं लेकर आया हूँ किसी की बेटी जो कि मेरी पत्नी है। किसी और की बेटी मेरी माँ के रुप में आयी।
तुम्हे नायाब हीरे के रुप में बहुत खास अनुभव किया। हमेशा यही सोचा भगवान ने कोई दुनिया में कोई इतना काबिल पुरुष बनाया ही नहीं की तुम्हे छुए भी। शादी तो बहुत दूर की बात है।
तुम्हारे लिए हमेशा एक विशेष उच्च लक्ष्य रहा दिमाग में। मुझे लगा तुम इस लक्ष्य को स्वीकार कर विश्व अधिनायक बनो और स्त्री का गौरन्वित करो। इसके लिए तुम विवाह, भोग आदि संसारिक कामनाओं से दूर रख विशेष अध्यात्मिक शक्तियाँ प्राप्त करो। और संसार में अनूठे काम करो नोबेल पुरस्कार जीतो।
मेरी इन बातों को स्वीकार करना न करना तुम्हारा स्वतंत्र अधिकार है।
विवाह के ऊपर मेरे आलेख और ह्यूमर विवाह के समर्थन में नहीं थे पर वह शाश्वत सिद्धांतो के आधार पर संकल्पनात्मक विश्लेषण थे। उसे मेरे विचार समझोगी तो पहली बात यह गलत होगा और तुम्हे बुरा लगेगा और विश्लेषण समझोगी तो केवल एक रिर्सोस अनुभव करोगी जो तुम्हे तुम्हारे निर्णयों में उचित मदद कर सकती हैं। उसमें से कुछ लेना या छोड़ना तुम्हारा विवेक है।
मम्मी से बातचित से आभास हो चुका है मुझे तुम पूरी तरह विवाह की इच्छुक हो और कोई लड़का को पसंद कर चुकी हो। यह मुझे खुल कर बोल सकती थी।
क्या तुम्हे यह नहीं अनुभव हुआ कि सर जानेंगे तो मदद ही करेंगे सपोर्ट ही करेंगे। यदि तुम ऐसा नहीं अनुभव कर पायी तो इसका अर्थ कि तुमने जाना ही नहीं मुझे। खैर।
यदि तुम खुल कर कहती का शादी करनी है तो मैं पूरी ताकत लगा कर लड़का ढूँढने में मदद करता। तुम मुझे इंसिस्ट कर के कह सकती थीं।
2 Feb 2009 (पहला दिन जब तुमसे मिला
था) से ले कर आज तक लगभग नौ वर्षों में तुम्हे हर पल भावनात्मक संबल देता रहा हूँ
साथ ही हर काम में तुम्हारा साथ निभाता रहा हूँ। इस इच्छा पर तुम्हारा साथ ही देता।
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